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jagannath mandir in puri । जगन्नाथ मंदिर का रहस्य और इतिहास?


jagannath mandir in puri ॥ जगन्नाथ मंदिर का रहस्य ॥ jagannath mandir puri

दोस्तों क्या आप एक ऐसे मंदिर के बारे में जानते हैं। जहां स्थापित भगवान कि मूर्ति के अंदर उस भगवान का असली धड़कता हुआ दिल है। और इस मंदिर का झंडा हमेशा हवा के उल्टा ही लहराता है जी हां यह बात बिल्कुल सच है।

Jagannath Mandir in puri.

और यह भी कहा जाता है कि जब भी उस भगवान की मूर्ति कि जगह नई मूर्ति बदली जाती है तब उस दिल को भी निकाल कर उसमें मूर्ति में स्थापित कर दिया जाता है और इस क्रम को करने के दौरान पूरे शहर की बिजली को बंद कर दिया जाता है और मंदिर के चारों तरफ अंधेरा कर दिया जाता है।


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ताकि कोई भी व्यक्ति उस दिल को ना देख सके कहा जाता है कि जो कोई भी उस दिल को देख लेता है उस व्यक्ति की मौत उसी पल हो जाती है इसी कारण चारों ओर अंधेरा करके ही दिल को नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है

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अगर हमारे इस लेख में दिए गए कोई जानकारी या फिर कोई भी शब्द अगर आपको गलत लगे या फिर आपके भावनाओं को ठेस पहुंचाए तो आप हम से कांटेक्ट कर सकते हो हालांकि हमने सभी जानकारियों कि अच्छे से पड़ताल करके ही इस लेख में लिखा है कृपया एक बार हमारे इस लेख को पूरा जरूर पढ़ें धन्यवाद

कौन है? भगवान जगन्नाथ।

हिंदू धर्म के भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेवों में से एक भगवान विष्णु जी के अवतार श्री कृष्ण जी को ही भगवान जगन्नाथ कहते हैं!


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jagannath mandir kahan hai

jagannath mandir flag

दोस्तों हम बात कर रहे हैं भारत के उड़ीसा राज्य के पूरी शहर में स्थापित विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ के मंदिर के बारे में जो हम हिंदुओं के चार धामों में से एक धाम है।


वैसे तो आपने भगवान कृष्ण जी के साथ हैं राधा जी और उनके कई सारे मूर्तियां और उनके मंदिर देखे होंगे लेकिन जगन्नाथ मंदिर में भगवान श्री कृष्ण उनके भाई बलराम जी और उनकी बहन सुभद्रा माता तीनों की मूर्तियां एक साथ स्थापित हैं।


दोस्तों आज के इस पूरे लेख ( jagannath mandir in puri ) में हम "जगन्नाथ मंदिर का रहस्य" जानेंगे। जिन्हें अब तक कोई भी विज्ञान नहीं सुलझा पाया है। साथ ही भगवान जगन्नाथ से जुड़े उनके इतिहास और उनसे जुड़े कुछ अनसुने रोचक कहानियां के बारे में भी बात करेंगे  


अगर आप भगवान जगन्नाथ से जुड़े उन सभी बातों को जानना चाहते हैं तो इस लेख को शुरू से लेकर अंत तक पूरा पढ़ें उम्मीद है कि आपको jagannath mandir in puri का यह लेख जरूर पसंद आएगा और कुछ नया जानने को जरूर मिलेगा।


जगन्नाथ मंदिर का इतिहास!

जगन्नाथ मंदिर का इतिहास

jagannath mandir in puri । जगन्नाथ मंदिर का इतिहास-  जगन्नाथ मंदिर का सबसे पहला प्रमाण आपको महाभारत के वनपर्व में मिल जाएगा। क्योंकि यह कहा जाता है की पहली बार सबर आदिवासी विश्‍ववसु जीने नीलमाधव के रूप में यहां पर पूजा की थी और आज भी पूरी शहर में स्थित हर मंदिरों में कई ऐसे सेवक मिल जाएंगे जिन्हें दैतापति के नाम से भी जाना जाता है।


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पूरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर किसने बनाया था?


मालवा के राजा महाराज इंद्रदयुम्न जिनके पिता जी का नाम भारत और माता का नाम सुमति था। असल में राजा इंद्रदयुम्न को जगन्नाथ मंदिर बनाने का ख्याल तब आया जब इन्होंने अपने सपने में जगन्नाथ यानी श्री कृष्ण जी के दर्शन किए थे भगवान श्री कृष्ण उनके सपने में आकर कहा की नीलांचल पर्वत की एक गुफा में उनकी एक मूर्ति है और श्री कृष्ण जी ने राजा को यह भी कहा कि उस गुफा से मेरी मूर्ति को इसी मंदिर में स्थापित कर दो उसके बाद राजा ने अपनी सेवकों को नीलांचल पर्वत मैं उस मूर्ति की खोज करने के लिए भेज दिया।


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मूर्ति की खोज करने वाले उन सेवकों में से ही एक ब्राह्मण विद्यापति भी था और उन्होंने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव के उस मूर्ति की पूजा करते हैं और उसका जिले के मुखिया विश्‍ववसु ने ही भगवान के उस मूर्ति को गुफा में छुपा कर रखा था।


विद्यापति ने अपनी चतुरतापन दिखाते हुए मुखिया की बेटी से तुरंत विवाह कर लिया और वह अपने पत्नी के जरिए नीलमाधव के उस गुफा तक पहुंच गया उसके बाद विद्यापति ने उस मूर्ति को छुड़ाकर राजा को दे दिया


वही विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी हो जाने से बहुत ही दुखी हुआ और भगवान अपने भक्तों के निराशा अपन को देखते हुए वापस गुफा में लौट गया लेकिन लौटते लौटते भगवान ने राजा इंद्रदयुम्न से यह वादा किया कि वह 1 दिन उनके पास वापस जरूर लौटेंगे बशर्ते उस राजा एक विशाल मंदिर बनाना होगा


तभी राजा ने मंदिर बनवाया और भगवान विष्णु जी से अपनी उस विशाल मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा तभी भगवान विष्णु जी ने उस राजा से कहा!,


कि तुम समुंद्र में तैर रहे उस बड़े पेड़ का टुकड़ा लाओ जो द्वारिका से तैरता हुआ यहां तक पूड़ी आ पहुंचा है और उसी से मेरी मूर्ति बनेगी। तभी राजा ने अपने सेवकों को आदेश दिया और उस पेड़ के टुकड़े को ढूंढ लिया गया।


लेकिन कई लोग मिलकर भी उस बड़े से पेड़ के टुकड़े को उठा नहीं पा रहे थे। सभी राजा कोई समझ आ गया त्याग शायद उन्हें नीलमाधव के भक्तों शहर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु जी का मदद लेना पड़ेगा!


जैसे ही विश्‍ववसु ने राजा के मदद के लिए तैयार हुआ उसके बाद सभी लोग हैरान रह गए कि जिस भारी-भरकम लकड़ी को कई सारे लोग मिलकर नहीं उठा पा रहे थे और उस लकड़ी को नीलमाधव के सच्चे भक्त विश्‍ववसु ने अकेले ही उठाकर मंदिर तक ले गया।


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उसके बाद अब बारी आई उस लकड़ी से भगवान की मूर्ति बनाने की राजा के बड़े से बड़े कारीगरों ने लाख कोशिश कर लिया लेकिन कोई भी कार्य करें उस लकड़ी में एक छैनी का खरोच तक नहीं लगा सका। तभी भगवान विश्वकर्मा जब तीनो लोक के सबसे कुशल कारीगर कहे जाते हैं बूढ़े व्यक्ति के रूप में वहां प्रकट हुए और उसने राजा से कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं लेकिन उन्होंने एक शर्त भी रखी शर्त यह था कि वह 21 दिन में उस मूर्ति को बनाकर तैयार तो कर देंगे लेकिन वह यह काम अकेले ही करेंगे मूर्ति बनाते हुए कोई भी दूसरा व्यक्ति नहीं देख सकता है


राजा ने उनकी शर्त मान ली और उसके बाद वह बूढ़े व्यक्ति के रूप में भगवान विश्वकर्मा मंदिर के अंदर चला गया और उस लकड़ी से भगवान की मूर्ति बनाने लगा हालांकि कोई व्यक्ति उसे मूर्ति बनाते हुए देख तो नहीं सका लेकिन अंदर से ऑडी छेनी हथौड़ी की आवाज लोगों को लगातार सुनाई दे रही थी।


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jagannath mandir puri!

फिर एक दिन राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंदीचा अपने आप को रोक नहीं सके और वह दरवाजे के नजदीक चली गई लेकिन उससे अब कोई भी आवाज सुनाई नहीं दे रहा था तो वह घबराकर इस बात की सूचना राजा को दे दिया उन्हें लगा कि कहीं उस बूढ़े व्यक्ति के साथ कुछ अनहोनी तो नहीं हो गया उसके बाद जब राजा आया तो राजा को भी ऐसा ही लगा और उसने सभी शर्तो और चेतावनी ओ को नजरअंदाज करते हुए कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दे दिया।


Jagannath Mandir puri जैसे ही कमरा खोला गया तो तो वह बूढ़ा व्यक्ति कमरे के अंदर से गायब था और वहां पर 3 अधूरी मूर्तियां पड़ी मिली जिसमें भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने हुए थे लेकिन उनकी टांगे नहीं बनाई गई थी जबकि मां सुभद्रा के हाथ पाव कुछ भी नहीं बनाए गए थे राजा ने इसे भगवान की इच्छा को मानकर इन्हीं तीनों अधूरी मूर्तियों को मंदिर में स्थापित कर दिया तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में स्थापित किए जाते हैं


हालांकि आप जो वर्तमान में मंदिर देख रहे हैं वह तब के मंदिर नहीं है वर्तमान के मंदिर सातवीं सदी में बनाया गया था और इस मंदिर का निर्माण दो ईसा पूर्व में हुआ यहां तक कि यह मंदिर 3 बार टूट भी चुका है जिसे 1174 ईस्वी में ओडीशा के शासक अनंग भीमदेव ने इसका दोबारा मरम्मत करवाया जहां आप जगन्नाथ मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े जो मंदिर देख रहे हो वह मंदिर भी उन्हीं के द्वारा बनाए गए थे


Rath Yatra / रथ यात्रा 

Rath yatra (रथ यात्रा)

स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु जी के अवतार श्री कृष्ण जी जगत के नाथ श्री जगन्नाथ पूरी जी का जन्म दिन होता है और उसी दिन प्रभु जगन्नाथ जी के बड़े भाई बलराम जी तथा दोनों प्रभु की बहन सुभद्रा के साथ उनके रत्न सिंहासन से उतारकर मंदिर के सामने ही बने स्नान मंडप में ले जाकर 108 कलश से उनका शाही स्नान किया जाता है


भगवान जगन्नाथ यात्रा हर साल के आषाढ़ मास ( आषाढ़ मास 25 जून से लेकर 24 जुलाई तक रहता है) के शुक्ल पक्ष के दूसरे तिथि को निकाला जाता है इस रथयात्रा में भगवान बलराम श्री जगदीश और माता देवी सुभद्रा रथोत्सव मनाया जाता है इस दौरान भगवान की तीनों मूर्तियों को अलग-अलग तीन रातों में स्थापित किया जाता है जैसे ही तीनों रखो की रथ यात्रा निकाली जाती है तब का नजारा बहुत ही भव्य लगता है।


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jagannath mandir puri कि यह रथ यात्रा भाईचारे और एकता का प्रतीक माना जाता है वहीं हजारों श्रद्धालु देश के अलग-अलग कोने से इस रथयात्रा मैं भाग लेने आते हैं और रथ को खींचने का सौभाग्य पाते हैं


कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति इसे रथ यात्रा में शामिल होते हैं उसे सुख समृद्धि और भगवान का आशीर्वाद मिलता है और इस रथ यात्रा में शामिल होने का अपना अलग ही आनंद होता है। या एक तरह से खुशी कह सकते हैं!


हालांकि अबकी बार कोरोनावायरस के चलते कई सारे भक्तों को इस रथ यात्रा में शामिल होने का अवसर तो नहीं मिल सका क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार जगन्नाथ रथ यात्रा एक सीमित दायरे और काफी गंभीर के साथ निकाली जाएगी ऐसा फैसला करो ना की तीसरी लड़ाई क्या शंका को देखते हुए लिया गया था। अब बस उम्मीद कर सकते हैं कि कोरोनावायरस की महामारी जल्दी खत्म हो और फिर से हम रथ यात्रा का भव्य नजारा देखें।


भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा ( Rath Yatra ) के पीछे का इतिहास क्या है? - jagannath mandir in puri!


रथ यात्रा के पीछे का इतिहास यह है कि पौराणिक कथाओं की माने तो तो उसने कहा गया है कि श्री कृष्ण जी की बहन माता सुभद्रा जब एक बार अपने मायके से लौटती है तब अपने दोनों भाइयों श्री कृष्ण और बलराम जी से अपने नगर घूमने की इच्छा जताती है कृष्ण जी और बलराम जी अपनी बहन सुभद्रा के साथ रथ से अपने नगर घूमते हैं, तभी से यह प्रचलन चलता आया है और इसे रथ यात्रा का नाम दिया गया है।


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जगन्नाथ मंदिर का इतिहास ॥ jagannath mandir rahasya katha!

जगन्नाथ मंदिर का इतिहास।

जगन्नाथ मंदिर का रहस्य ॥ jagannath mandir ka rahasya!!


तो चलिए विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के बारे में उन 10 rochak tathya को जानते हैं ! जिनके पीछे का सच आज भी कई सारे विज्ञान से जुड़े लोगों को पता नहीं चल पाया है


  1. भगवान jagannath mandir के सबसे ऊपर स्थापित ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में ही लहराता है और ऐसा किन कारणों से होता है इसका पता अभी तक नहीं लगाया गया है वही इस झंडे को प्रत्येक दिन बदलने का भी नियम है कहा यह भी जाता है कि अगर किसी एक दिन भी झंडा को ना बदला जाए तो मंदिर 18 साल तक बंद हो जाएगी।

  2. 4 लाख वर्ग फुट के क्षेत्र में फैले इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 214 फिट है और इस मंदिर के सामने खड़े होकर इसके गुंबद को देख पाना लगभग पूरी तरह से असंभव है क्योंकि इसके गुंबद की छाया हमेशा अदृश्य ही रहती है जो कि एक रहस्य बना हुआ है

  3. मंदिर के ऊपर एक सुदर्शन चक्र लगा हुआ है जो कि अष्ट धातु का बनाया गया है और कहा जाता है कि यह सुदर्शन चक्र बहुत ही ज्यादा पवित्र है और साथ ही इस चकली की बनावट इस तरह से है कि आप इन्हें किसी भी दिशा से देखो यह आपको हमेशा सीधी ही दिखाई पड़ेगी और आप इसे पूरी में कहीं से भी आसानी से देख सकते हो

  4. बाकी जगहों पर समुंद्र से हवा जमीन की और आती है लेकिन अगर आप पूरी में है तो आप देखेंगे की जमीन से समुद्र की ओर हवा जाती है

  5. दोस्तों आप आमतौर पर देखेंगे किसी भी मंदिर मस्जिद या की चर्च पर तो वहां पर आपको अक्सर मंदिर मस्जिद के ऊपर चिड़िया बैठते हुए दिख जायेगी लेकिन जगन्नाथ मंदिर मैं ऐसा नहीं होता है क्योंकि वहां पर मंदिर के ऊपर से कभी भी किसी भी पक्षी को उड़ते हुए या बैठते हुए नहीं देखा गया है। और एक संयोग यह भी है कि उस मंदिर के उपर से किसी भी हवाई जहाज का रास्ता जाता ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि वहां पर नो फ्लाइंग जोन किया हुआ है यह बस खुद ब खुद ऐसा संयोग हो गया है 

  6. दोस्त आप यह जानकर हैरान होंगे की जगन्नाथ मंदिर के ऊपर लगा ध्वज यानी कि झंडा हर शाम को बदला जाता है वह भी जो भी व्यक्ति झंडा बदलने जाता है उसे उल्टे पैर मंदिर के ऊपर चढ़कर झंडे को बदलना होता है। दोस्तों ध्वज इतना भव्य दिखने में लगता है कि जब भी यह लहराता है लोग बस ऐसे ही देखते रहते हैं साथ ही इस ध्वज शिव जी का चंद्रे भी बना हुआ है।

  7. कहा गया है कि जगन्नाथ मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी रसोई भी है, इस रसोई में 500 रसोईया और 300 उनके सहकर्मी काम करते हैं इनसे जुड़ी एक बहुत बड़ी रहस्य यह भी है कि यहां चाहे लाखों भक्त भी क्यों ना आ जाए यहां का प्रसाद घटता ही नहीं है और जब मंदिर बंद होने वाली रहती है तब तक पूरा प्रसाद खत्म हो जाता है ऐसा जानबूझकर तो नहीं बस संयोग में ऐसा हो जाता है इसे चमत्कार कहे या फिर क्या पता नहीं लेकिन यह भी एक रहस्य ही बना हुआ है

  8. यहां पर बनाए गए  प्रसाद लकड़ी के चूल्हे में बनाए जाते हैं यह प्रसाद कुल 7 बर्तनों में बनाए जाते हैं इन सातों बर्तनों को एक के ऊपर एक सीधा रखा जाता है यानी कि 7 तो बर्तन एक चूल्हे पर एक साथ रखे होते हैं और सबसे अचंभित बात यह है इन बर्तनों में से सबसे ऊपर जो बर्तन रखा होता है उनमें सबसे पहले प्रसाद बनकर तैयार होता है उसके बाद उससे नीचे फिर उसके नीचे अंत में जो सबसे नीचे बर्तन रखा हुआ होता है मिनी जिस बर्तन पर चूल्हे की आग लगती है जिसे सबसे पहले पकना चाहिए उसी बर्तन के प्रसाद सबसे अंत में बनते है।

  9. आप मंदिर के अंदर सिंह द्वारा के जरिए ही प्रवेश कर सकते हैं और यहां अचंभित करने वाली बात यह है कि जब आप सिंह द्वार के बाहर होते हैं तब आपको समुद्र की भारी शोर सुनाई देती है लेकिन आप जब जैसे ही सिंह द्वार के अंदर प्रवेश करते हैं बाहर की सभी आवाज आना बंद हो जाती है जॉब को समंदर की लहरों की भारी शोर जो सुनाई देती थी वह सिंह द्वार के अंदर प्रवेश करते ही सुनाई देना बंद हो जाती है और यह भी अभी तक रहस्य बना हुआ है।

  10. जगन्नाथ मंदिर में स्थापित तीन मूर्तियों को हर 12 साल में एक बार बदला जाता है लेकिन वह मूर्तियां लकड़ी की बनाई जाती है और जब भी मूर्तियां बदली जाती है तब पूरे शहर की बिजली काट दी जाती है और मंदिर के चारों और पूरा अंधेरा कर दिया जाता है और मंदिर के चारों और सीआरपीएफ के जवान तैनात कर दिए जाते हैं और मंदिर के अंदर सिर्फ मूर्ति बदलने वाला पुजारी ही जा सकता है।


तो दोस्तों यह रह जगन्नाथ मंदिर से जुड़े कुछ हैरान कर देने वाले रोचक तथ्य मुझे उम्मीद है कि आपको यह पसंद आए होंगे।

दोस्तों आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जब भगवान कृष्ण जी ने अपना मानवी शरीर का त्याग किया था तब उनके ह्रदय को छोड़कर बाकी का पूरा शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया था और कहा जाता है कि वही भगवान कृष्ण का दिल अभी तक जीवित इंसानों के दिल की तरह धड़क रहा है  और उनका  दिल भगवान जगन्नाथ के लकड़ी के मूर्ति के अंदर अभी तक विराजित है।


दोस्तों यह रही भगवान जगन्नाथ मंदिर से जुड़े 10 रहस्य में और अचंभित कर देने वाले चमत्कारों के बारे में कुछ बातें हालांकि हम इन बातों की पूरी तरह से तो पुष्टि नहीं करते लेकिन नेट पैक भक्त होने के नाते हम भगवान पर पूरी तरह से यकीन रखते हैं इस लिखे गए सभी बातें ऑफिशियल जानकारी के सूत्रों से ली गई है लेकिन इन सभी रहस्य से पर्दा अभी तक कोई भी ज्ञान भी नहीं उठा पाया है


दोस्तों आपको हमारा यह आर्टिकल कैसा लगा अगर आप आज से पहले भगवान जगन्नाथ मंदिर के बारे में इन सभी बातों को नहीं जानते थे तो इस आर्टिकल को अपने दोस्त और परिवारों के साथ भी जरूर शेयर करें और साथ ही हमारे वेबसाइट पर दिए गए ऐसे ही रहस्यमय रोमांचक जानकारियों से भरी पोस्ट को भी जरूर पढ़े उम्मीद है कि आप को भी पसंद आए हम उम्मीद करते हैं कि आप हमारे इस वेबसाइट पर दोबारा जरूर आएंगे तब तक के लिए धन्यवाद।


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